• University of Jammu





    List of Instruction for Faculty Members for Using Moodle Site

    Now You can access Moodle directly from Jammu University Website by clicking on Link JU-LMS

    • How to Reset Password

      Follow the How to Login and Update Profile in Moodle

    • Create your Course by Choosing Course Categories listed on Site as per your Department 
    • follow the  Creating Course in Moodle LMS
    • You can also Add a New Course by Clicking on Add a new Course Icon and Then In the Course windows please select Course Categories as per your department 
    • Before Uploading PPT,PDF etc in folder , ZIP the Folder then Upload and also rename each file as per Unit/Topic
    • Instead of Uploading Video or Audio Lectures,Share the Link of Same from your google drive or other URL in your course by using Url activity
    • Always Keep Backup of each Contents, You upload in the Moodle in your course 

    User Manual for Course Creator/Student can be found here

    1.Login Manual for All

    https://docs.google.com/document/d/12JCxuUqPF1sC8gvozCf4GkgLeK2SnTuw/edit?usp=sharing&ouid=109074050484386629096&rtpof=true&sd=true

    2.Student Module

    https://docs.google.com/document/d/1S8xV1-O6Y0HiKgpLD35VGhPVCXs4Od1w/edit?usp=sharing&ouid=109074050484386629096&rtpof=true&sd=true

    3.Course Creator Module-1

    https://docs.google.com/document/d/1S8xV1-O6Y0HiKgpLD35VGhPVCXs4Od1w/edit?usp=sharing&ouid=109074050484386629096&rtpof=true&sd=true

    4..Course Creator Module-2 for adding Assignments in Moodle for Students

    https://docs.google.com/document/d/1UC9RoGQs1utgokzkEYaHUC_lE4MlQ1Bb/edit?usp=sharing&ouid=109074050484386629096&rtpof=true&sd=true

    5.Format for Sending data of Faculty and Students to be added

    https://drive.google.com/file/d/1vtpqdRH9aA2eG1V7OircHr1LHPJq1LS9/view?usp=sharing


    Note: Please don't upload your Files comprising of PPT,PDF,Video,Audio in Moodle Instead use URL to Share the resources and Please see Demo how to insert URL from add and Activity or resource Tab from below Link

    https://drive.google.com/file/d/11Ga24ZBO0fjbc3JNpD5rSn_Mmv58ZWLI/view?usp=share_link


    • This Video Demonstrate how to Create Course in Moodle lMS

    • This Video is demonstrating how to enroll /unenroll students in a course provided students have been added from backend by Moodle Administrator.

    • This Video demonstrate using Quiz with Moodle LMS.

    • This video demonstrate how teachers can evaluate the Minor or Answer Sheets on LMS

    • This Video demonstrate how Minor or Assignment can be conducted using Moodle LMS

    • वेदसनातन धर्म के प्राचीनतम और आधारभूत धर्म ग्रन्थ हैं। वेद, विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य भी हैं। वेद भारतीय दर्शन के जनक, प्रेरक और मानक भूमिकाओं में केंद्रीय स्थान प्राप्त हैं।

      वेद वैदिक साहित्य का हिस्सा है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक शब्दों के माध्यम से पहुंचा। इसलिए इसे श्रुति (सुनना ) भी कहते हैं।

      आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार हैं :-

      • ऋग्वेद - चार वेदों में से ऋग्वेद दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ है और इसलिए इसे मानवता का पहला नियम भी कहा जाता है ऋग्वेद में १०२८ भजन और १०५८० छंद है। जो १० मंडलों में (दूसरे से सातवें तक ) को गोत्र/वंश मंडल कूल ग्रंथ कहा जाता है। तीसरे मंडल में गायत्री मन्त्र है। दसवें मंडल में पुरुषसूक्त है जो वर्णों - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र की व्याख्या करता है। पहला और दसवां मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया।
      • यजुर्वेद - इसमें कार्य (क्रिया) व यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये १९७५ गद्यात्मक मन्त्र हैं। यह दो भागों में विभाजित है कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद।
      • सामवेद - इस वेद का प्रमुख विषय उपासना है। संगीत में लगे सुर को गाने के लिये १८७५ संगीतमय मंत्र। यह भारतीय संगीत का आधार है।
      • अथर्ववेद - इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, एवं यज्ञ के लिये ५९७७ कवितामयी मन्त्र हैं।

      चारों वेदों का सम्बन्ध यज्ञ से है| यज्ञ करने में चार प्रकार के ऋत्विजों की आवश्यकता होती है| यथा- • होता • उद्गाता •अध्वर्यु • ब्रह्मा | को अपौरुषेय (जिसे किसी पुरुष के द्वारा न किया जा सकता हो, (अर्थात् ईश्वर कृत) माना जाता है। यह ज्ञान विराटपुरुष से व कारणब्रह्म से श्रुति परम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया माना जाता है। यह भी मान्यता है कि परमात्मा ने सबसे पहले चार महर्षियों जिनके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम थे; के आत्माओं में क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान दिया, उन महर्षियों ने फिर यह ज्ञान ब्रह्मा को दिया। इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। क्योंकि इन्हें सुनकर के लिखा गया था। अन्य आर्य ग्रंथों को स्मृति कहते हैं। वेद मंत्रों की व्याख्या करने के लिए अनेक ग्रंथों जैसे ब्राह्मण-ग्रन्थआरण्यक और उपनिषद की रचना की गई। इनमे प्रयुक्त भाषा वैदिक संस्कृत कहलाती है जो लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भ स्रोत माना जाता है। संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्त्व बना हुआ है।

      वेदों को समझना प्राचीन काल से ही पहले भारतीय और बाद में संपूर्ण विश्व भर में एक वार्ता का विषय रहा है। इसको पढ़ाने के लिए छः अंगों - शिक्षाकल्पनिरुक्तव्याकरणछन्द और ज्योतिष के अध्ययन और उपांगों जिनमें छः शास्त्र - पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदांत व दस उपनिषद् - इशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतिरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक आते हैं। प्राचीन समय में इनको पढ़ने के बाद वेदों को पढ़ा जाता था। प्राचीन काल के वशिष्ठशक्तिपराशरवेदव्यासजैमिनीयाज्ञवल्क्यकात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों के अच्छे ज्ञाता माना जाता है। मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायण का रचा चतुर्वेदभाष्य माधवीय वेदार्थदीपिका बहुत मान्य हैं। यूरोप के विद्वानों का वेदों के बारे में मत हिन्द-आर्य जाति के इतिहास की जिज्ञासा से प्रेरित रही है। अतः वे इसमें लोगों, जगहों, पहाड़ों, नदियों के नाम ढूँढते रहते हैं - लेकिन ये भारतीय परंपरा और गुरुओं की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता। अठारहवीं सदी उपरांत यूरोपियनों के वेदों और उपनिषदों में रूचि आने के बाद भी इनके अर्थों पर कई विद्वानों में असहमति बनी रही है। वेदों में अनेक वैज्ञानिक विश्लेषण प्राप्त होते हैं।


    • वेदसनातन धर्म के प्राचीनतम और आधारभूत धर्म ग्रन्थ हैं। वेद, विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य भी हैं। वेद भारतीय दर्शन के जनक, प्रेरक और मानक भूमिकाओं में केंद्रीय स्थान प्राप्त हैं।

      वेद वैदिक साहित्य का हिस्सा है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक शब्दों के माध्यम से पहुंचा। इसलिए इसे श्रुति (सुनना ) भी कहते हैं।

      आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार हैं :-

      • ऋग्वेद - चार वेदों में से ऋग्वेद दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ है और इसलिए इसे मानवता का पहला नियम भी कहा जाता है ऋग्वेद में १०२८ भजन और १०५८० छंद है। जो १० मंडलों में (दूसरे से सातवें तक ) को गोत्र/वंश मंडल कूल ग्रंथ कहा जाता है। तीसरे मंडल में गायत्री मन्त्र है। दसवें मंडल में पुरुषसूक्त है जो वर्णों - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र की व्याख्या करता है। पहला और दसवां मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया।
      • यजुर्वेद - इसमें कार्य (क्रिया) व यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये १९७५ गद्यात्मक मन्त्र हैं। यह दो भागों में विभाजित है कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद।
      • सामवेद - इस वेद का प्रमुख विषय उपासना है। संगीत में लगे सुर को गाने के लिये १८७५ संगीतमय मंत्र। यह भारतीय संगीत का आधार है।
      • अथर्ववेद - इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, एवं यज्ञ के लिये ५९७७ कवितामयी मन्त्र हैं।

      चारों वेदों का सम्बन्ध यज्ञ से है| यज्ञ करने में चार प्रकार के ऋत्विजों की आवश्यकता होती है| यथा- • होता • उद्गाता •अध्वर्यु • ब्रह्मा | को अपौरुषेय (जिसे किसी पुरुष के द्वारा न किया जा सकता हो, (अर्थात् ईश्वर कृत) माना जाता है। यह ज्ञान विराटपुरुष से व कारणब्रह्म से श्रुति परम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया माना जाता है। यह भी मान्यता है कि परमात्मा ने सबसे पहले चार महर्षियों जिनके अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम थे; के आत्माओं में क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान दिया, उन महर्षियों ने फिर यह ज्ञान ब्रह्मा को दिया। इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। क्योंकि इन्हें सुनकर के लिखा गया था। अन्य आर्य ग्रंथों को स्मृति कहते हैं। वेद मंत्रों की व्याख्या करने के लिए अनेक ग्रंथों जैसे ब्राह्मण-ग्रन्थआरण्यक और उपनिषद की रचना की गई। इनमे प्रयुक्त भाषा वैदिक संस्कृत कहलाती है जो लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भ स्रोत माना जाता है। संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्त्व बना हुआ है।

      वेदों को समझना प्राचीन काल से ही पहले भारतीय और बाद में संपूर्ण विश्व भर में एक वार्ता का विषय रहा है। इसको पढ़ाने के लिए छः अंगों - शिक्षाकल्पनिरुक्तव्याकरणछन्द और ज्योतिष के अध्ययन और उपांगों जिनमें छः शास्त्र - पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदांत व दस उपनिषद् - इशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडुक्य, ऐतरेय, तैतिरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक आते हैं। प्राचीन समय में इनको पढ़ने के बाद वेदों को पढ़ा जाता था। प्राचीन काल के वशिष्ठशक्तिपराशरवेदव्यासजैमिनीयाज्ञवल्क्यकात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों के अच्छे ज्ञाता माना जाता है। मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायण का रचा चतुर्वेदभाष्य माधवीय वेदार्थदीपिका बहुत मान्य हैं। यूरोप के विद्वानों का वेदों के बारे में मत हिन्द-आर्य जाति के इतिहास की जिज्ञासा से प्रेरित रही है। अतः वे इसमें लोगों, जगहों, पहाड़ों, नदियों के नाम ढूँढते रहते हैं - लेकिन ये भारतीय परंपरा और गुरुओं की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता। अठारहवीं सदी उपरांत यूरोपियनों के वेदों और उपनिषदों में रूचि आने के बाद भी इनके अर्थों पर कई विद्वानों में असहमति बनी रही है। वेदों में अनेक वैज्ञानिक विश्लेषण प्राप्त होते हैं।


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